गुस्सा मेरा शौक नहीं,
बस जब मन की तकलीफ बता नहीं पाता,
तो चिड़चिड़ापन बनकर बाहर आता है।
हर बार नाराज़गी के पीछे नफ़रत नहीं होती,
कभी-कभी बहुत सारी अनकही बातें होती हैं।
कभी थकान होती है,
कभी उम्मीद टूटती है,
और कभी किसी दर्द को शब्दों में कह पाना मुश्किल होता है।
इसलिए अगर कभी मेरा मिज़ाज़ बदला हुआ लगे,
तो मेरे गुस्से को मत देखना...
एक बार मेरे अंदर जमा हुई
तकलीफ को समझने की कोशिश करना।
बस जब मन की तकलीफ बता नहीं पाता,
तो चिड़चिड़ापन बनकर बाहर आता है।
हर बार नाराज़गी के पीछे नफ़रत नहीं होती,
कभी-कभी बहुत सारी अनकही बातें होती हैं।
कभी थकान होती है,
कभी उम्मीद टूटती है,
और कभी किसी दर्द को शब्दों में कह पाना मुश्किल होता है।
इसलिए अगर कभी मेरा मिज़ाज़ बदला हुआ लगे,
तो मेरे गुस्से को मत देखना...
एक बार मेरे अंदर जमा हुई
तकलीफ को समझने की कोशिश करना।