दिल की गहराई में एक सवाल है,बदलने की नाराज़गी जाहिर तो कर दी
काश कि देख पाती कि बदले भी तो क्यों,
तुमने ही तो बदला हर बात पे मुझे
अब बात करने के बजाए काश में हो।
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क्या तुमने कभी सोचा था, या बस ऐसा ही था।
हमेशा ही बदलते गए, फिर भी यही ख्वाहिश,
काश कुछ ऐसा होता, जिससे दोनों के बीच की दूरी खत्म होती।





