जब महफिलों की शोर मेंशाखों पे पत्ते थे, पत्तों में बूंदे थी।
बूंदों में पानी था, पानी में आँसू थे.....
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ना जाने क्यों दिल भर गया
ना जाने क्यों आँख भर गई।
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दिल की आवाज दबाते हैं
अगले ही क्षण खुद
को फिर तन्हा पाते हैं
फिर जब कोई सन्नाटा
शोर को खा जाता है
तब मदहोशी में जब
कुछ भी होश नहीं रह जाती है
ना जाने क्यों, वो मुझको
हर बार नजर आ जाती है

