थर्रा जाए काल भी जिससे, ऐसी इसकी काया है,
इसने मूँछों के ताव में, सारा जग झुकाया है...
सिर पर बँधा जो साफ़ा है, वो केवल एक वस्त्र नहीं,
शत्रु का संहार करे जो, उससे कम कोई अस्त्र नहीं...
रणभेरी जब-जब गूँजेगी, यह काल बनकर टूटेगा,
इसके स्वाभिमान के आगे, हर पर्वत भी फूटेगा...
नसों में बिजली दौड़ रही, आँखों में दहकता अंगारा,
काँप उठी धरती भी जब, इसने वीर घोष ललकारा...
झुके नहीं जो आंधी में, वो आन-बान की शान है,
यह मरुधरा का सिंह खड़ा, साक्षात वीर बलिदान है...
काट दे जो बाधाओं को, ऐसी इसकी धार है,
मिट्टी का यह लाल अकेला, सवा लाख पर भारी है...
नत मस्तक जो कभी न होगा, वह प्रचंड अभिमान है,
पगड़ी की हर एक सिलवट में, सिमटा हिंदुस्तान है...
चक्रवात सी मूँछें इसकी, काल को ललकारतीं,
इसकी आँखों की चमक ही, शत्रुओं को मारती...
यह शांत खड़ा है तो मत समझो, यह केवल एक इंसान है,
इसके भीतर सोया हुआ, सदियों का स्वाभिमान है...
रक्त में इसके उबाल है, और भुजाओं में वज्र सा बल,
मातृभूमि की रक्षा को, यह तत्पर रहता हर पल...
जब-जब संकट छाया है, इसने ही शस्त्र उठाया है,
अपनी आन की खातिर इसने, शीश तलक चढ़ाया है...!!!

इसने मूँछों के ताव में, सारा जग झुकाया है...
सिर पर बँधा जो साफ़ा है, वो केवल एक वस्त्र नहीं,
शत्रु का संहार करे जो, उससे कम कोई अस्त्र नहीं...
रणभेरी जब-जब गूँजेगी, यह काल बनकर टूटेगा,
इसके स्वाभिमान के आगे, हर पर्वत भी फूटेगा...
नसों में बिजली दौड़ रही, आँखों में दहकता अंगारा,
काँप उठी धरती भी जब, इसने वीर घोष ललकारा...
झुके नहीं जो आंधी में, वो आन-बान की शान है,
यह मरुधरा का सिंह खड़ा, साक्षात वीर बलिदान है...
काट दे जो बाधाओं को, ऐसी इसकी धार है,
मिट्टी का यह लाल अकेला, सवा लाख पर भारी है...
नत मस्तक जो कभी न होगा, वह प्रचंड अभिमान है,
पगड़ी की हर एक सिलवट में, सिमटा हिंदुस्तान है...
चक्रवात सी मूँछें इसकी, काल को ललकारतीं,
इसकी आँखों की चमक ही, शत्रुओं को मारती...
यह शांत खड़ा है तो मत समझो, यह केवल एक इंसान है,
इसके भीतर सोया हुआ, सदियों का स्वाभिमान है...
रक्त में इसके उबाल है, और भुजाओं में वज्र सा बल,
मातृभूमि की रक्षा को, यह तत्पर रहता हर पल...
जब-जब संकट छाया है, इसने ही शस्त्र उठाया है,
अपनी आन की खातिर इसने, शीश तलक चढ़ाया है...!!!




