एक शख़्स किताबों जैसा था
इस शहर में कितने लोग मिले,
कुछ अपने थे, कुछ राहों में मिले।
सब आए और फिर भुला दिए गए,
कुछ चेहरे भी यादों से मिटा दिए गए।
अब सोचता हूँ तो कुछ याद नहीं,
कौन अपना था, कौन साथ नहीं।
मगर एक शख़्स किताबों जैसा था,
हर पन्ना उसका लाजवाब-सा था।
वो शख़्स ज़ुबानी याद हुआ,
दिल में जैसे कोई फ़साना आबाद हुआ।
हज़ारों चेहरों की भीड़ में मिला,
पर वही सबसे अलग, सबसे ख़ास हुआ।
शहर बदला, रास्ते बदल गए,
कई रिश्ते वक्त के साथ ढल गए।
मगर उसकी बातें आज भी साथ हैं,
कुछ लोग दूर होकर भी दिल के पास हैं।
— Written by Jarvis
