वाह! बहुत खूब।...तख़्त-ए-सिकंदरी की नहीं जुस्तजू हमें,
तुम नज़र घुमाओ, हम खुद में एक ज़माना हैं…

Thank you bhaiवाह! बहुत खूब।...![]()
वाहतख़्त-ए-सिकंदरी की नहीं जुस्तजू हमें,
तुम नज़र घुमाओ, हम खुद में एक ज़माना हैं…
इक उम्र तक मैं उस की ज़रूरत बना रहावाह
ये तो बात ही अलग लेवल की है…
जो खुद में एक ज़माना हों, उन्हें तख़्त की क्या ज़रूरत!![]()
वाह…इक उम्र तक मैं उस की ज़रूरत बना रहा
फिर यूँ हुआ कि उस की ज़रूरत बदल गई

Takht-e-Sikandari ki nahi justuju humein,तख़्त-ए-सिकंदरी की नहीं जुस्तजू हमें,
तुम नज़र घुमाओ, हम खुद में एक ज़माना हैं…
Ek umr tak main us ki zarurat bana raha,इक उम्र तक मैं उस की ज़रूरत बना रहा
फिर यूँ हुआ कि उस की ज़रूरत बदल गई
जैसा मूड हो वैसा मंज़र होता हैEk umr tak main us ki zarurat bana raha,
Phir yun hua ki us ki zarurat badal gayi.
Wo jo kehta tha ki tum bin guzara nahi mumkin,
Waqt kya badla, us ka saara sahara badal gaya.
Main ek puraane libaas ki tarah almari mein reh gaya,
Mausam naya aaya toh us ka nazara badal gaya.
Galti meri hi thi jo main wafa ki talaash mein tha,
Use bas kaam tha mujhse, aur jab kaam nikla toh chehra badal gaya.
" KHERIYAT TAK NAHI PUCHHI USNE EK MUDDAT SE,
JISSE KABHI MERI KHAMOSHI SE BHI SHIKAYAT HUA KARTI THI".
तेरी मुस्कान का नशा ऐसा चढ़ा
होके बेगैरत दुनिया की नज़र से उतर गया